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जगन्नाथ रथ यात्रा 2026: हर साल पुरी पहुंचते लाखों भक्त, जानें दुनिया के सबसे बड़े रथ उत्सव से जुड़े 9 इंटरेस्टिंग फैक्ट्स

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा दुनिया के सबसे बड़े रथ उत्सवों में गिनी जाती है। हर साल लाखों श्रद्धालु इस भव्य आयोजन के लिए पुरी पहुंचते हैं। इस वर्ष आज निकलने वाली रथ यात्रा में भी 10 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है।

भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा विशाल रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। इस यात्रा से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं और मान्यताएं हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

1. साल में सिर्फ एक बार मंदिर से बाहर आते हैं भगवान

रथ यात्रा ही वह अवसर होता है जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा गर्भगृह से बाहर निकलकर भक्तों को दर्शन देते हैं। इसी दौरान लाखों श्रद्धालु बेहद करीब से भगवान के दर्शन कर पाते हैं।

2. हर साल नए रथ बनाए जाते हैं

पुरी की रथ यात्रा की सबसे खास बात यह है कि तीनों रथ हर साल नए बनाए जाते हैं। इनका निर्माण विशेष प्रकार की लकड़ी और सदियों पुरानी पारंपरिक तकनीकों से किया जाता है।

3. रथ बनाने में नहीं होती लोहे की कीलों का इस्तेमाल

रथों के कई हिस्से पारंपरिक लकड़ी की जोड़ाई तकनीक से तैयार किए जाते हैं। इसके निर्माण में आधुनिक तकनीकों के बजाय पारंपरिक शिल्पकला को प्राथमिकता दी जाती है।

4. भगवान जाते हैं गुंडिचा मंदिर

रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। मान्यता है कि यह भगवान की मौसी का घर है। तीनों देवता यहां नौ दिन तक विश्राम करते हैं और फिर वापस श्रीमंदिर लौटते हैं।

5. सुना बेशा की खास परंपरा

वापसी के बाद भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन को सुना बेशा में सोने के आभूषणों से सजाया जाता है। यह परंपरा भगवान की दिव्यता और जगत के स्वामी के रूप में उनकी महिमा का प्रतीक मानी जाती है।

6. पुरी के गजपति महाराजा लगाते हैं रथों में झाड़ू

रथ यात्रा के दौरान छेरा पहंरा नामक परंपरा निभाई जाती है। इसमें पुरी के गजपति महाराजा सोने की झाड़ू से तीनों रथों की सफाई करते हैं। यह संदेश देती है कि भगवान के सामने सभी समान हैं, चाहे राजा हो या आम व्यक्ति।

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